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छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, ₹81 लाख के सेटलमेंट के बाद पति-पत्नी के तलाक को मिली मंजूरी


छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने पति-पत्नी के बीच लंबे समय से चल रहे वैवाहिक विवाद को समाप्त करते हुए आपसी सहमति से तलाक को मंजूरी दे दी है। …और पढ़ें

Publish Date: Fri, 13 Mar 2026 09:14:55 PM (IST)Updated Date: Fri, 13 Mar 2026 09:14:55 PM (IST)

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, ₹81 लाख के सेटलमेंट के बाद पति-पत्नी के तलाक को मिली मंजूरी
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का बड़ा फैसला।

HighLights

  1. छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का बड़ा फैसला।
  2. सेटलमेंट के बाद पति-पत्नी के तलाक को मंजूरी।
  3. समझौते के तहत तय हुई आर्थिक व्यवस्था।

नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने पति-पत्नी के बीच लंबे समय से चल रहे वैवाहिक विवाद को समाप्त करते हुए आपसी सहमति से तलाक को मंजूरी दे दी है। हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान दंपती के बीच मध्यस्थता केंद्र में समझौता हुआ था।

इसके तहत पति ने पत्नी को 51 लाख रुपये गुजारा भत्ता देने व दोनों बेटियों के नाम 15-15 लाख रुपये की एफडी कराने पर सहमति जताई। अदालत ने समझौते को स्वीकार करते हुए आपसी सहमति से तलाक को मंजूरी प्रदान कर दी। डिवीजन बेंच ने फैमिली कोर्ट के फैसले के बाद यह राहत दी है।

वैचारिक मतभेदों के कारण 2018 से अलग रह रहा था दंपति

जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की डिवीजन बेंच ने यह फैसला दंपती के बीच सुलह की संभावना खत्म होने और दोनों बेटियों के भविष्य की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए सुनाया।

मामले के अनुसार, महाराष्ट्र के राजोली निवासी व्यक्ति की शादी 21 मई 2006 को छत्तीसगढ़ की निवासी महिला से हिंदू रीति-रिवाज के साथ हुई थी। शादी के बाद दंपती की दो बेटियां हुईं। कुछ वर्षों तक सब कुछ सामान्य रहा, लेकिन बाद में दोनों के बीच वैचारिक मतभेद बढ़ने लगे। विवाद इतना बढ़ गया कि अक्टूबर 2018 से दोनों अलग-अलग रहने लगे।

पति ने क्रूरता के आधार पर मांगा था तलाक

अलग रहने के दौरान पति ने क्रूरता का आरोप लगाते हुए फैमिली कोर्ट में तलाक की याचिका दायर की थी। मामले की सुनवाई के बाद फैमिली कोर्ट ने छह जुलाई 2024 को फैसला सुनाते हुए कहा कि क्रूरता के आरोप पर्याप्त रूप से साबित नहीं हो पाए हैं। इस आधार पर कोर्ट ने पति की तलाक याचिका खारिज कर दी थी।

फैमिली कोर्ट के आदेश के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील

फैमिली कोर्ट के फैसले से असंतुष्ट होकर पति ने हाई कोर्ट में अपील दायर की। मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों को विवाद सुलझाने के लिए मध्यस्थता केंद्र भेज दिया। वहां कई दौर की चर्चा के बाद 18 अगस्त 2025 को दोनों ने आपसी सहमति से अलग होने का निर्णय लिया।

समझौते के तहत तय हुई आर्थिक व्यवस्था

मध्यस्थता केंद्र में हुए समझौते के अनुसार पति ने पत्नी को 51 लाख रुपए गुजारा भत्ता देने पर सहमति दी। इसके अलावा दोनों बेटियों के सुरक्षित भविष्य के लिए 15-15 लाख रुपये की एफडी कराने का भी निर्णय लिया गया।

पत्नी को भुगतान डिमांड ड्राफ्ट के माध्यम से अलग-अलग किश्तों में दिया गया। 23 फरवरी 2026 तक शेष 46 लाख रुपये का भुगतान भी पूरा कर दिया गया, जिसे पत्नी ने स्वीकार कर लिया।

हाई कोर्ट ने समझौते के आधार पर दी तलाक की मंजूरी

मध्यस्थता केंद्र में हुए इस समझौते और दोनों पक्षों की सहमति को देखते हुए हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने विवाह संबंध समाप्त करने की अनुमति दे दी। अदालत ने माना कि दंपती के बीच अब साथ रहने की कोई संभावना नहीं बची है, इसलिए आपसी सहमति से तलाक ही उचित समाधान है।



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