सिर्फ गौशाला को सौंपे जाएंगे कत्लखाने ले जाने वाले मवेशी:मवेशियों की तस्करी के मामले में हाईकोर्ट का अहम आदेश, आरोपी को सुपुर्दनामा पर नहीं देने का आदेश

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तस्करी और कत्लखाने ले जाए जा रहे कृषि में उपयोग होने वाले मवेशियों को लेकर हाईकोर्ट ने अहम फैसला दिया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने कहा कि मुकदमा चलने के दौरान पुलिस द्वारा जब्त किए गए मवेशियों की सुपुर्दगी किसी भी निजी व्यक्ति, वाहन चालक या उसके कथित मालिक को नहीं दी जा सकती। जब तक मामले की सुनवाई यानी ट्रायल पूरा नहीं हो जाता, तब तक जब्त मवेशियों को सिर्फ और सिर्फ पंजीकृत गौशाला, गोसदन या गोरक्षण संस्थान की कस्टडी में ही रखा जाएगा। दरअसल, जशपुर जिले के मनोरा पुलिस चौकी में ट्रक क्रमांक एचआर 55 क्यू 5980) को पकड़ा था गया था। ट्रक में 23 नर और 5 मादा भैंसों को छत्तीसगढ़ से झारखंड के कत्लखाने ले जाया जा रहा था। इसके बाद मवेशियों के मालिक गुमला झारखंड निवासी मो. वसीम कुरैशी ने अदालत से मवेशियों को सुपुर्दनामे पर मांगने के लिए अर्जी लगाई थी। सीजेएम जशपुर और फिर सेशन कोर्ट ने इस आवेदन को खारिज कर दिया था। सीजेएम के आदेश को हाईकोर्ट में दी चुनौती
इसके बाद आरोपी ने हाईकोर्ट में याचिका लगाई। सुनवाई के दौरान सिंगल बेंच ने पूर्व में आए जलील अंसारी विरुद्ध छत्तीसगढ़ शासन के फैसले पर पुनर्विचार की बात कही और मामला लॉर्जर बेंच को भेज दिया। आरोपियों को ही मवेशी देने से कानून का उद्देश्य खत्म हो जाएगा
मामले पर दिए गए आदेश में हाईकोर्ट ने कहा कि छत्तीसगढ़ कृषक पशु परिरक्षण अधिनियम, 2004 की धारा 7 और 18 का स्पष्ट आदेश है कि जब तक मुकदमा खत्म नहीं होता, जब्त पशु पंजीकृत गौशालाओं की कस्टडी में ही रहेंगे। यदि पशुओं की तस्करी करने वाले आरोपियों को ही मवेशी वापस दे दिए जाएंगे, तो इस कानून को बनाने का मुख्य उद्देश्य ही खत्म हो जाएगा। हाई कोर्ट ने माना कि विशेष अधिनियम को सामान्य सीआरपीसी की धाराओं पर प्राथमिकता है, इसलिए मजिस्ट्रेट के पास सामान्य धाराओं का इस्तेमाल कर आरोपी को पशु सौंपने का अधिकार नहीं है।
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