छत्तीसगढ़

शरिया कोर्ट पर छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की दोटूक, निजी संस्था नहीं कर सकती तलाक का फैसला


छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने कहा कि निजी धार्मिक संस्था या शरिया कोर्ट कानूनी अदालत नहीं है। वह विवाह, तलाक या वैवाहिक अधिकारों का न्यायिक निर्धारण नहीं कर …और पढ़ें

Publish Date: Wed, 09 Sep 2026 12:11:40 PM (IST)Updated Date: Wed, 09 Sep 2026 12:27:08 PM (IST)

शरिया कोर्ट पर छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की दोटूक, निजी संस्था नहीं कर सकती तलाक का फैसला
शरिया कोर्ट पर हाई कोर्ट की दोटूक। (फाइल फोटो)

HighLights

  1. निजी धार्मिक संस्थाओं को वैधानिक अदालत का दर्जा नहीं मिल सकता।
  2. शरिया संस्था विवाह या तलाक का कानूनी निर्धारण नहीं करेगी।
  3. हाई कोर्ट ने इदारा-ए-शरिया का आदेश अमान्य घोषित किया।

नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने मुस्लिम महिला के वैवाहिक अधिकारों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि कोई निजी धार्मिक संस्था या स्वयं को शरिया कोर्ट बताने वाला संगठन कानून से स्थापित अदालत का दर्जा नहीं प्राप्त कर सकता। ऐसी संस्थाएं न तो किसी महिला के वैवाहिक दर्जे का न्यायिक निर्धारण कर सकती हैं और न ही विवाह विच्छेद की कानूनी घोषणा कर सकती हैं।

कोर्ट ने रायपुर के इदारा-ए-शरिया इस्लामी कोर्ट द्वारा 18 जनवरी 2022 को जारी उस आदेश को कानूनी अधिकार से रहित घोषित कर दिया, जिसमें याचिकाकर्ता महिला को उसके पति से तलाकशुदा बताया गया था।

ये है पूरा मामला

  • जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद ने यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि इदारा-ए-शरिया का आदेश किसी वैधानिक न्यायिक व्यवस्था से जारी नहीं हुआ है। इसलिए उससे न विवाह समाप्त हो सकता है और न किसी पक्ष के कानूनी अधिकार, स्थिति या दायित्व में बदलाव हो सकता है।

  • याचिकाकर्ता टिकरापारा रायपुर निवासी निरोश अब्बासी, पत्नी मोहम्मद आबिद खान,(38 वर्ष) के पहले पति की वर्ष 2015 में मृत्यु हो गई थी। इसके बाद 18 जुलाई 2020 को उनका विवाह मोहम्मद आबिद खान से हुआ। विवाह के बाद बच्चों के नए परिवार में समायोजन को लेकर पति-पत्नी के बीच विवाद हुआ।
  • याचिकाकर्ता के अनुसार इसी विवाद के बाद उन्हें तलाक देने की प्रक्रिया शुरू की गई। पति ने कहा कि उन्होंने तलाक-ए-हसन तीन चरणों में 31 अगस्त, 30 सितंबर और 30 अक्टूबर 2021 को संचार के माध्यम से घोषित किया था।
  • उत्पीड़न की शिकायत पर दर्ज है एफआइआर

    याचिकाकर्ता ने पति और ससुराल वालों के खिलाफ उत्पीड़न, क्रूरता और दुर्व्यवहार की शिकायत की थी। वन स्टाप सखी सेंटर में काउंसिलिंग भी हुई, लेकिन विवाद का समाधान नहीं हुआ। इसके बाद सात अक्टूबर 2021 को उन्होंने पुलिस अधीक्षक के समक्ष शिकायत की। महिला थाना रायपुर में एक नवंबर 2021 को एफआइआर दर्ज की गई, जिसमें भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए और 34 के तहत अपराध दर्ज हुआ।

    सुप्रीम कोर्ट का फैसला बना आधार

    • हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विश्व लोचन मदन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि दारुल कजा या फतवा जारी करने वाली संस्थाओं को कानून से स्थापित न्यायालय का दर्जा प्राप्त नहीं है। उनके निर्णय बाध्यकारी नहीं होते और उन्हें कानूनी प्रक्रिया से लागू नहीं कराया जा सकता।
    • इसी सिद्धांत के आधार पर हाई कोर्ट ने कहा कि इदारा-ए-शरिया किसी व्यक्ति के वैवाहिक दर्जे का न्यायिक निर्धारण नहीं कर सकता। धार्मिक संस्था अपनी धार्मिक राय दे सकती है, लेकिन वह राय कानूनी अधिकारों पर बाध्यकारी नहीं हो सकती।

    तलाक-ए-हसन की संवैधानिक वैधता पर यह कहा

    • हाई कोर्ट ने तलाक-ए-हसन की संवैधानिक वैधता के प्रश्न पर फैसला देने से परहेज किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसके आदेश का एफआइआर या पक्षकारों के अन्य वैधानिक उपायों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।
    • आपराधिक मामले और अन्य कानूनी अधिकारों का निर्धारण संबंधित सक्षम प्राधिकारी कानून के अनुसार करेंगे। कोर्ट ने याचिका आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए इदारा-ए-शरिया इस्लामी कोर्ट के 18 जनवरी 2022 के आदेश को कानूनी अधिकार से रहित घोषित किया।



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