छत्तीसगढ़

पेड़ से लाल चींटियां उतारो और सिलबट्टे पर पीस दो! गजब है बस्तर की मशहूर ‘चापड़ा चटनी’


हम बात कर रहे हैं बस्तर की विश्वप्रसिद्ध ‘चापड़ा चटनी’ की। यह एक ऐसा अनोखा स्वाद है, जिसे चखने के लिए सात समंदर पार से लोग बस्तर के आदिवासी हाट-बाजारों में खिंचे चले आते हैं।

आइए जानते हैं कि साल और महुआ के पेड़ों से उतरकर यह लाल चींटी इंसानी थाली तक कैसे पहुंचती है और इसके पीछे का गजब का विज्ञान क्या है।

क्या है ‘चापड़ा’ और कैसे होती है इसकी खोज?

naidunia_image

स्थानीय आदिवासी बोली ‘हल्बी’ में ‘चापड़ा’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है, ‘चापा’ यानी पौधों के पत्तों का घोंसला और ‘ड़ा’ यानी पत्तों के भीतर रहने वाली लाल चींटियां।

ये कोई आम चींटियां नहीं हैं। इन्हें ‘विवर आंट्स’ (Weaver Ants) कहा जाता है। ये चींटियां बस्तर के घने जंगलों में साल (सखुआ), महुआ और आम के ऊंचे पेड़ों के पत्तों को अपने लार के जाले से जोड़कर फुटबॉल के आकार का एक बेहद मजबूत घोंसला बनाती हैं।

जोखिम से भरा है इसे इकट्ठा करना

इन चींटियों को पेड़ से उतारना कोई बच्चों का खेल नहीं है। ये चींटियां बहुत आक्रामक होती हैं और जब काटती हैं, तो तेज जलन होती है। बस्तर के ग्रामीण बड़ी कुशलता से बांस की लंबी बल्लियों की मदद से इन घोंसलों को तोड़ते हैं और चींटियों व उनके सफेद अंडों को एक टोकरी में इकट्ठा करते हैं। इस दौरान वे अपने शरीर पर राख मल लेते हैं ताकि चींटियां उन्हें ज्यादा न काटें।

सिलबट्टे पर पिसकर ऐसे तैयार होती है ‘फायर रेसिपी’

naidunia_image

पेड़ से टोकरी में आने के बाद शुरू होता है इसे बनाने का पारंपरिक तरीका। इस रेसिपी में किसी आधुनिक मिक्सी या ग्राइंडर का इस्तेमाल नहीं होता, क्योंकि असली स्वाद तो पत्थर के सिलबट्टे से ही आता है।

सफाई का ध्यान रखना – सबसे पहले चींटियों और उनके सफेद अंडों को पत्तों से अलग किया जाता है।

मसालों की जुगलबंदी – इसके बाद सिलबट्टे पर ढेर सारी साबुत सूखी लाल मिर्च, लहसुन की कलियां, अदरक का एक टुकड़ा, नमक और थोड़ा सा हरा धनिया रखा जाता है।

जिंदा चींटियों की पिसाई – अब इन मसालों के साथ जिंदा लाल चींटियों और उनके अंडों को एक साथ रखकर बारीक पीसा जाता है।

चटख लाल रंग की चटनी – पीसते ही चींटियों के शरीर से निकलने वाला प्राकृतिक एसिड मसालों के साथ मिल जाता है। तैयार होती है चटख लाल रंग की, बेहद तीखी और लाजवाब खट्टी ‘चापड़ा चटनी’।

स्वाद ही नहीं, सेहत का सुपरफूड है चापड़ा

naidunia_image

यह चटनी सिर्फ बस्तर के लोगों का शौक नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरा विज्ञान और सदियों पुरानी चिकित्सा पद्धति छुपी हुई है।

नेचुरल एंटीबायोटिक (Formic Acid) – लाल चींटियों के डंक में फॉर्मिक एसिड होता है। यही एसिड चटनी को बिना नींबू या इमली के एक प्राकृतिक खट्टापन (Zesty Flavor) देता है।

प्रोटीन और विटामिन का खजाना – वैज्ञानिक रिसर्च के अनुसार, इन लाल चींटियों और उनके अंडों में प्रचुर मात्रा में प्रोटीन, आयरन, कैल्शियम, जिंक और विटामिन B-12 पाया जाता है।

बीमारियों की अचूक दवा – बस्तर के आदिवासियों का मानना है कि चापड़ा चटनी खाने से सर्दी, खांसी, फ्लू और यहाँ तक कि मलेरिया जैसी बीमारियों से राहत मिलती है। तेज बुखार होने पर तो ग्रामीणों को जानबूझकर इन चींटियों से कटवाया भी जाता है, ताकि उनका तापमान कम हो सके।

जब गॉर्डन रामसे भी हो गए दीवाने – दुनिया के सबसे मशहूर और बेहद सख्त मिजाज शेफ गॉर्डन रामसे (Gordon Ramsay) जब भारत के खान-पान पर एक डॉक्यूमेंट्री बनाने बस्तर आए थे, तो उन्होंने न सिर्फ इस चटनी को खुद पेड़ पर चढ़कर इकट्ठा किया, बल्कि इसे चखने के बाद अपनी उंगलियां चाटते रह गए थे। उन्होंने इसे ‘बेहद स्वादिष्ट और लाजवाब’ बताया था।

ग्लोबल मार्केट में धूम

बस्तर की इस पारंपरिक चापड़ा चटनी की लोकप्रियता अब छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं है। भारत के अलग-अलग हिस्सों (जैसे ओडिशा और झारखंड) में भी इसे खाया जाता है। हाल ही में ओडिशा की ‘काई चटनी’ (जो कि लाल चींटी की ही चटनी है) को जीआई टैग (GI Tag) मिला है, जिसके बाद बस्तर की चापड़ा चटनी को भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक नई पहचान मिली है और इसकी डिमांड फाइव स्टार होटलों के शेफ्स के बीच भी होने लगी है।

तो अगली बार जब आप छत्तीसगढ़ के बस्तर की सैर पर जाएं, तो चित्रकोट वॉटरफॉल देखने के साथ-साथ किसी स्थानीय हाट-बाजार में जरूर रुकें। वहां महुआ के पत्तों के दोने में परोसी जाने वाली ‘चापड़ा चटनी’ का एक निवाला जरूर चखें। यह स्वाद आपके सफर को हमेशा के लिए यादगार बना देगा!



Source link

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!