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बाढ़ में गोद में बच्ची लेकर नदी पार करती हैं दो शिक्षिकाएं, बलरामपुर कलेक्टर ने की सराहना

बलरामपुर जिले के वाड्रफनगर विकासखंड के सुदूर ग्राम धौरपुर में पदस्थ दो महिला शिक्षिकाएं बरसात के दिनों में नदी का उफनता पानी और पथरीला रास्ता पार करके बच्चों तक शिक्षा का उजाला पहुंचा रही हैं। इनमें एक शिक्षिका की गोद में नौ माह की मासूम कपड़े से बंधी रहती है, दूसरे हाथ में छाता और कंधे पर बैग लिए वे घुटने भर उफनते पानी और पथरीले रास्ते से गुजरती हैं।

वाड्रफनगर जनपद के ग्राम पंचायत मढ़ना का आश्रित ग्राम धौरपुर है। जंगलों के बीच बसा इस गांव में महज 15 से 20 घर हैं। यहां तक पहुंचने के लिए बरसात में मोरन और इरिया नदी के संगम को पार करना पड़ता है। शासन ने 2005 में यहां प्राथमिक शाला शुरू की थी, ताकि अंतिम व्यक्ति तक शिक्षा पहुंचे। इस वर्ष यहां नौ बच्चे दर्ज हैं और उन्हें पढ़ाने के लिए दो महिला शिक्षिकाएं कर्मिला टोप्पो और संध्या हालदार पदस्थ हैं।

शिक्षिकाओं ने बताया कि वे घर से निकलते तो स्कूटी से हैं, लेकिन उसे मढ़ना गांव में ही खड़ा करना पड़ता है। उसके बाद लगभग तीन किलोमीटर पथरीला रास्ता पैदल तय करते हैं, फिर नदी पार करते हैं। उन्होंने कहा कि डर तो लगता है, पानी का बहाव होता है, गोद में बच्ची भी रहती है।

कर्मिला टोप्पो वर्ष 2014 से इसी स्कूल में पदस्थ हैं और हर बरसात में यही संघर्ष उनकी दिनचर्या बन गया है। जबकि संध्या हालदार की पदस्थापना उनके बाद हुई है। नदी में बाढ़ होने पर स्कूल तक नहीं पहुंच पाने से इन्हें निराशा भी होती है कि आज बच्चों को पढ़ा नहीं पाए।

इतनी परेशानी और जीवन को दांव पर रखकर बच्चों को पढ़ाने जाने के सवाल पर थोड़ी देर तक तो वे चुप रहती हैं, लेकिन जवाब में दोनों की आंखों में बच्चों के लिए ममता झलकती है। वे कहती हैं कि बच्चे हमारा इंतजार करते हैं कि मैडम कब आएगी। हम नहीं जाएंगे तो उनका क्या होगा? उनके भविष्य का सवाल है। जब पानी ज्यादा होता है और हम नहीं पहुंच पाते तो रात भर मन उदास रहता है।

शिक्षिकाओं ने कहा कि विभागीय अधिकारी परिस्थितियों से वाकिफ हैं, इसलिए नदी में पानी का बहाव तेज होने पर स्कूल नहीं जाने की समझाइश भी देते हैं। एक ओर जहां इन शिक्षिकाओं का समर्पण प्रेरणा है, वहीं यह व्यवस्था पर सवाल भी खड़ा करता है। क्या बरसात के दिनों में इन नौ बच्चों को नजदीकी आश्रम-छात्रावास में शिफ्ट नहीं किया जा सकता, ताकि उनकी पढ़ाई निर्बाध चलती रहे और शिक्षिकाओं को जान जोखिम में न डालना पड़े?

सरकार जब अंतिम छोर तक सड़क, बिजली, पानी का दावा करती है तो धौरपुर तक एक पुलिया, एक पहुंच मार्ग क्यों नहीं बन पाया? बरसात में यह गांव क्यों टापू बन जाता है? शिक्षिकाएं तो अपना धर्म निभा रही हैं, अब बारी प्रशासन की है कि वह इनके हौसले को सम्मान दे और धौरपुर तक सुविधाओं का पुल बनाए।

इन शिक्षिकाओं की कर्त्तव्यनिष्ठा कलेक्ट्रेट बलरामपुर तक पहुंच चुकी है। कलेक्टर चंदन संजय त्रिपाठी ने कहा कि मुझे मीडिया के माध्यम से हमारे जिले की एक शिक्षिका के बारे में पता चला, जो बरसात के मौसम में भी अपने छोटे बच्चे को गोद में लेकर नदी पार करके तीन किलोमीटर पैदल चलकर अपने स्कूल पहुंचती हैं।

कलेक्टर ने कहा कि अपनी अटूट निष्ठा और मेहनत से उन्होंने जिले के अन्य शिक्षकों के लिए एक सराहनीय उदाहरण प्रस्तुत किया है। मैं ऐसे शिक्षकों का बहुत सम्मान करती हूं जो अपने कर्तव्यों के प्रति इतने समर्पित हैं, ऐसे शिक्षक सचमुच दुर्लभ हैं। उनके जैसी शिक्षिका को सम्मानित करना पूरे जिले के लिए गर्व और गौरव की बात है। यह सिर्फ नौकरी नहीं, तपस्या है। ऐसे शिक्षकों से अन्य शिक्षकों को सीख लेनी चाहिए। यह वाकई काबिले तारीफ है।

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