छत्तीसगढ़

34 साल बाद मिला इंसाफ, 1992 की FIR और 2026 में चार्जशीट, जानिए पूर्व लिपिक मोहम्मद साबिर की पूरी दास्तां


नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुरः हाई कोर्ट ने 34 साल पुराने आपराधिक मामले में अहम फैसला सुनाते हुए सरगुजा के पूर्व लिपिक मोहम्मद साबिर के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद कर दी। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल के डिवीजन बेंच ने कहा कि जांच कोई खुली अवधि वाली वैधानिक प्रक्रिया नहीं है। राज्य को अपराध की जांच उचित समय में पूरी करने का संवैधानिक दायित्व है। किसी व्यक्ति के सिर पर दशकों तक आपराधिक मुकदमे की तलवार लटकाए नहीं रखी जा सकती।

मामला वर्ष 1992 में दर्ज एफआइआर से जुड़ा था, जबकि चार्जशीट 23 जून 2026 को यानी करीब 34 साल बाद पेश की गई। कोर्ट ने माना कि इतनी असाधारण देरी के लिए याचिकाकर्ता जिम्मेदार नहीं था। इसके साथ ही उसके खिलाफ अभियोजन स्वीकृति का अभाव, पहले क्लोजर रिपोर्ट पेश किए जाने और अपराध में उसकी स्पष्ट भूमिका सामने नहीं आने को भी महत्वपूर्ण आधार माना गया।

मोहम्मद साबिर वर्ष 1992 में भूमि अधिग्रहण विभाग, अंबिकापुर में ग्रेड-दो क्लर्क थे। आरोप था कि ग्राम रेवाापुर की खसरा नंबर 478 की भूमि के मुआवजे के लिए 12,840.55 रुपये का चेक तैयार हुआ था। आरोप के मुताबिक सहआरोपित तत्कालीन संयुक्त कलेक्टर/भूमि अधिग्रहण अधिकारी अमीर अली ने राशि बढ़ाकर 5,12,840.55 रुपये कर दी और फर्जी बचत खाते के माध्यम से रकम निकाल ली।

इस मामले में सात अक्टूबर 1992 को अंबिकापुर कोतवाली में एफआइआर दर्ज हुई थी। याचिकाकर्ता की ओर से बताया गया कि उसके खिलाफ अभियोजन स्वीकृति नहीं दी गई थी और पुलिस ने उसके संबंध में क्लोजर रिपोर्ट पेश की थी। आठ जून 2016 की स्वीकृति में भी केवल सहआरोपित अमीर अली और अनूप कुमार कश्यप के खिलाफ अभियोजन की अनुमति दी गई थी। इसके बावजूद आगे की जांच के बाद 23 जून 2026 को साबिर के खिलाफ चार्जशीट दाखिल कर दी गई और 25 जून को विशेष न्यायाधीश ने संज्ञान ले लिया।

कोर्ट ने माना- 34 साल की देरी से आरोपित को गंभीर पूर्वाग्रह

हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के अब्दुल रहमान अंतुले, महेंद्र लाल दास, पंकज कुमार, राबर्ट लालचुंगनुंगा चोंगथु और साहिल अब्दुलसत्तार मंसूरी के फैसलों का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि त्वरित जांच और सुनवाई संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित अधिकार है। लंबे समय की देरी से गवाहों की उपलब्धता, दस्तावेजों के संरक्षण और घटनाओं की स्मृति प्रभावित होती है। डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि हर देरी से आपराधिक मामला स्वतः खत्म नहीं होता।

लेकिन इस मामले में करीब 34 साल की असाधारण देरी के साथ याचिकाकर्ता की ओर से देरी में कोई योगदान नहीं, अभियोजन स्वीकृति का अभाव, पहले क्लोजर रिपोर्ट की जानकारी और अपराध में उसकी स्पष्ट एवं जानबूझकर भूमिका का ठोस साक्ष्य नहीं होना-इन सभी परिस्थितियों को संयुक्त रूप से देखा गया।

एफआईआर से संज्ञान तक की कार्रवाई रद

कोर्ट ने अंबिकापुर कोतवाली में दर्ज अपराध, 23 जून 2026 की चार्जशीट और 25 जून 2026 के संज्ञान आदेश को याचिकाकर्ता के संबंध में निरस्त कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इसका लाभ केवल मोहम्मद साबिर को मिलेगा और अन्य आरोपितों के खिलाफ कार्यवाही इससे प्रभावित नहीं होगी।



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