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शांति समझौता या सिर्फ दिखावा:कहां-कहां फंसा है पेच? पांच वजहें जिससे फिर भड़क सकता है ईरान-अमेरिका तनाव – Us Iran West Asia Peace Negotiations Here Are The Five Main Issues


पश्चिम एशिया में पिछले कुछ समय से जारी युद्ध को रोकने के लिए परदे के पीछे एक बहुत बड़ा खेल चल रहा है। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति अमेरिका और उसका पुराना दुश्मन ईरान एक समझौते के बेहद करीब पहुंच गए हैं। लेकिन ट्विस्ट यह है कि इस संभावित समझौते का कोई भी कागज या आधिकारिक मसौदा अभी तक सामने नहीं आया है। रविवार दोपहर तक की स्थिति यह थी कि किसी को भी ठीक-ठीक नहीं पता था कि दोनों देशों के बीच असल में क्या खिचड़ी पकी है या फिर कोई बड़ी बात तय हुई भी है या नहीं!

जब दोनों देशों के बड़े अधिकारियों से बात की गई, तो उनकी बातों में जमीन-आसमान का अंतर मिला। अमेरिका कुछ और कहानी बता रहा है, तो ईरान कुछ और। आइए बिल्कुल आसान भाषा में समझते हैं कि वो पांच बड़े मुद्दे कौन से हैं, जिनकी वजह से बात बनते-बनते अटक रही है।


1.परमाणु बम का खतरा और यूरेनियम का भंडार

सबसे बड़ा झगड़ा ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का साफ कहना है कि ईरान को अपना अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम (हाइली एनरिच्ड यूरेनियम) का पूरा भंडार नष्ट करना होगा। अमेरिका और इस्राइल को डर है कि ईरान इससे परमाणु बम बना सकता है। ईरान इसके लिए बिल्कुल तैयार नहीं है। अब जरा आंकड़ों का खेल समझिए। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के मुताबिक, ईरान के पास इस समय 60% तक संवर्धित लगभग 970 पाउंड यूरेनियम है। इसके अलावा, अलग-अलग लेवल का लगभग 11 टन और यूरेनियम भी उसके पास जमा है।

किसने क्या कहा?

न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, एक अमेरिकी अधिकारी ने रविवार को कहा कि ईरान इस यूरेनियम को नष्ट करने के लिए सैद्धांतिक रूप से मान गया है। हालांकि, इसे कैसे नष्ट किया जाएगा, इस पर अभी बात चल रही है। भविष्य में ईरान यूरेनियम संवर्धन करेगा या नहीं, इस पर बाद में बात होगी। इस बीच अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने भारत यात्रा के दौरान कहा, ‘आप 72 घंटे में परमाणु समझौता नहीं कर सकते। उन्होंने संकेत दिया कि अमेरिका एक छोटे और अस्थाई समझौते के लिए तैयार है, लेकिन अगर दो महीने में बात नहीं बनी, तो ईरान पर हमले की धमकी दोबारा दी जा सकती है।

परमाणु स्टॉक को लेकर कोई सहमति नहीं- ईरान

ईरान के तीन बड़े अधिकारियों ने शनिवार को साफ कह दिया कि परमाणु स्टॉक को लेकर कोई सहमति नहीं बनी है। वे शुरू में इस मुद्दे पर बात ही नहीं करना चाहते थे। उनका कहना है कि परमाणु से जुड़े सभी मुद्दों पर अगले 30 से 60 दिनों में बातचीत होगी।

2. समंदर के रास्ते होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान का कब्जा

होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया का एक ऐसा समुद्री रास्ता है, जहां से पूरी दुनिया के तेल और गैस की सप्लाई होती है। 28 फरवरी को जब अमेरिका और इस्राइल ने ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू किया, तब तक यह रास्ता बिल्कुल खुला था। युद्ध शुरू होते ही ईरान ने इस रास्ते से गुजरने वाले कमर्शियल जहाजों पर हमले करके इसे बंद कर दिया, जिससे पूरी दुनिया में तेल-गैस महंगी हो गई। जवाब में, अप्रैल महीने में अमेरिका ने ईरान के सारे बंदरगाहों और जहाजों की नौसैनिक नाकेबंदी कर दी। रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान अब इस रास्ते से गुजरने वाले जहाजों से टैक्स वसूलने की कोशिश कर रहा है, जिसे एक्सपर्ट्स अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन मान रहे हैं।

कहां फंसा है पेच ?

ईरान के अधिकारियों का कहना है कि वे इस रास्ते से बिना पैसे लिए जहाजों को जाने देंगे, लेकिन बदले में अमेरिका को अपनी नौसैनिक नाकेबंदी हटानी होगी। इस पर डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर साफ लिखा कि जब तक शांति समझौता नहीं हो जाता, अमेरिका की नाकेबंदी पूरी ताकत से जारी रहेगी।

यह भी पढ़ें: परमाणु निरस्त्रीकरण की कोशिशें नाकाम: अमेरिका की चेतावनी- ईरान पर आंखें मूंद रहीं दुनिया, हिज्बुल्ला की धमकी

3. फ्रीज संपत्ति: अरबों डॉलर का हिसाब-किताब

अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के कारण ईरान का बहुत सारा पैसा विदेशी बैंकों के खातों में फ्रीज पड़ा है। ईरान चाहता है कि इस समझौते के बहाने उसकी 25 बिलियन डॉलर यानी 2,395.61 अरब रुपये की रुकी हुई संपत्ति उसे वापस मिल जाए। वहीं, अमेरिकी अधिकारी ने कहा कि अभी हम फूटी कौड़ी भी नहीं दे रहे हैं। हां, अगर ईरान परमाणु वादे पूरे करेगा, तो आगे चलकर पैसा रिलीज करने के बारे में सोचेंगे। डोनाल्ड ट्रंप हमेशा से पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा की आलोचना करते आए हैं, जिन्होंने 2015 में ईरान को 1.7 बिलियन डॉलर यानी 162.9 अरब रुपये की फ्रीज संपत्ति लौटाई थी। ट्रंप 2018 में उस पुरानी डील से बाहर आ गए थे, इसलिए वे अब आसानी से ईरान को पैसा नहीं देना चाहते।

4. ईरान के मददगार लड़ाके 

ईरान पूरे पश्चिम एशिया में कई विद्रोही गुटों की मदद करता है। इनमें लेबनान का हिजबुल्ला सबसे मजबूत है। लेबनान में युद्धविराम की घोषणा के बाद भी हाल के हफ्तों में इस्राइल और हिजबुल्ला के बीच लगातार गोलाबारी हो रही है। इस नई डील के होते ही लेबनान समेत सभी मोर्चों पर लड़ाई पूरी तरह रुक जाएगी। अमेरिकी अधिकारियों ने इस डील में हिजबुल्ला या बाकी प्रॉक्सी गुटों का नाम तक नहीं लिया है। इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने रविवार को कहा कि उनकी ट्रंप से बात हुई है। ट्रंप ने भरोसा दिया है कि लेबनान समेत हर मोर्चे पर इस्राइल को अपनी रक्षा करने का पूरा हक है।


5. इस्राइल की सबसे बड़ी टेंशन ईरान की मिसाइलें

ईरान के पास बैलिस्टिक मिसाइलों का बहुत बड़ा जखीरा है, जिसकी जद में इस्राइल और खाड़ी के अरब देश आते हैं। शुरुआत में ट्रंप प्रशासन ने कहा था कि ईरान को अपनी मिसाइलें खत्म करनी होंगी या उनकी रेंज कम करनी होगी। लेकिन अमेरिकी अधिकारी ने रविवार को एक चौंकाने वाला खुलासा किया कि अभी जिस डील पर चर्चा हो रही है, उसमें ईरान की मिसाइलों का कोई जिक्र ही नहीं है। इस बात से इस्राइल बेहद नाराज है। विश्लेषकों का मानना है कि अगर मिसाइलों का मुद्दा हल नहीं हुआ, तो इस्राइल भविष्य में अकेले ही ईरान के मिसाइल ठिकानों पर हमला कर सकता है, जिससे नया युद्ध भड़क जाएगा।



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