छत्तीसगढ़

‘SDM को नहीं है विकलांग प्रमाण पत्र की वैधता तय करने का अधिकार’, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला


CG हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रमाण पत्र की सत्यता केवल सक्षम मेडिकल बोर्ड ही निर्धारित कर सकता है, राजस्व अधिकारी नहीं। …और पढ़ें

Publish Date: Mon, 06 Apr 2026 02:54:55 PM (IST)Updated Date: Mon, 06 Apr 2026 02:54:55 PM (IST)

'SDM को नहीं है विकलांग प्रमाण पत्र की वैधता तय करने का अधिकार', छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
बिलासपुर हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय (फाइल फोटो)

HighLights

  1. SDM के पास चिकित्सा विशेषज्ञता और अधिकार क्षेत्र का अभाव
  2. 2010 की विकलांगता का 2018 की रिपोर्ट से मूल्यांकन गलत
  3. पारिवारिक विवाद के कारण भाई ने दर्ज कराई थी शिकायत

नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था देते हुए स्पष्ट किया है कि किसी भी व्यक्ति के विकलांगता प्रमाण पत्र की वैधता और उसकी प्रामाणिकता की जांच करने का एकमात्र अधिकार सक्षम चिकित्सा बोर्ड (Medical Board) को है। जस्टिस एके प्रसाद की सिंगल बेंच ने एक शिक्षक की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि राजस्व अधिकारियों (SDM) के पास चिकित्सा विशेषज्ञता नहीं होती, इसलिए वे ऐसे प्रमाण पत्रों को अमान्य घोषित नहीं कर सकते।

क्या था पूरा मामला?

पूरा प्रकरण महासमुंद जिले का है, जहां लखन बिहारी पटेल वर्ष 2010 में विकलांग श्रेणी के अंतर्गत सहायक शिक्षक के पद पर नियुक्त हुए थे। उस समय जिला चिकित्सा बोर्ड ने उन्हें 45.4 प्रतिशत ‘श्रवण बाधित’ (Hearing Impaired) होने का प्रमाण पत्र जारी किया था।

विवाद की शुरुआत तब हुई जब दिसंबर 2017 में लखन बिहारी के सगे भाई, कैलाश चंद्र पटेल ने पारिवारिक भूमि विवाद के चलते कलेक्टर से शिकायत की। शिकायत में आरोप लगाया गया कि शिक्षक ने हेराफेरी कर फर्जी प्रमाण पत्र के आधार पर नौकरी पाई है। इस शिकायत पर कलेक्टर ने SDM (राजस्व) को जांच के निर्देश दिए।

SDM की जांच और कानूनी खामियां

13 अगस्त 2020 को एसडीएम ने अपनी जांच रिपोर्ट में याचिकाकर्ता शिक्षक पर धोखाधड़ी का आरोप लगाते हुए उनके प्रमाण पत्र को अमान्य कर दिया और आपराधिक कार्यवाही की सिफारिश की। हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि एसडीएम ने 2010 के मूल प्रमाण पत्र को गलत साबित करने के लिए 2018 की एक ऑडियोमेट्रिक रिपोर्ट का आधार बनाया था।

अदालत ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि समय के साथ विकलांगता की स्थिति में सुधार होना या बदलाव आना पिछले प्रमाण पत्र के फर्जी होने का सबूत नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने इसे ‘साक्ष्य की त्रुटि’ करार दिया।

अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन और वैधानिक तंत्र

जस्टिस एके प्रसाद ने अपने फैसले में जोर दिया कि ‘विकलांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम, 2016’ की धारा 52 के तहत एक वैधानिक तंत्र निर्धारित है। अधिकारियों ने इस कानूनी प्रक्रिया को दरकिनार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि किसी भी सरकारी अधिकारी को तकनीकी आकलन के लिए विशेष चिकित्सा बोर्ड की राय पर ही निर्भर रहना चाहिए। हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि याचिकाकर्ता को अपना पक्ष रखने या स्वतंत्र चिकित्सा साक्ष्य प्रस्तुत करने का उचित अवसर नहीं दिया गया, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।

कोर्ट का अंतिम आदेश

अदालत ने एसडीएम द्वारा जारी आदेश और आपराधिक कार्रवाई की सिफारिश को पूरी तरह रद्द कर दिया है। साथ ही, एसडीएम को निर्देश दिया गया है कि वे याचिकाकर्ता का मूल प्रमाण पत्र तत्काल वापस करें। हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि प्रशासन चाहे तो 2016 के अधिनियम के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन करते हुए सक्षम चिकित्सा बोर्ड के माध्यम से प्रमाण पत्र का पुनः सत्यापन कराने के लिए स्वतंत्र है।



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