छत्तीसगढ़

रायपुर में होली की मस्ती पर भारी केमिकलयुक्त रंग, 26 साल से नहीं हुई रंगों जांच; दांव पर लोगों की सेहत


नईदुनिया प्रतिनिधि, रायपुर। राजधानी में होली पर बिकने वाले रंग और गुलाल की गुणवत्ता जांच को लेकर गंभीर लापरवाही सामने आई है। मिलावटी और केमिकलयुक्त रंगों की जांच की जिम्मेदारी जिला प्रशासन, नगर निगम, पर्यावरण विभाग और खाद्य विभाग की होने के बावजूद 26 वर्षों में एक भी रंग का सैंपल जांच के लिए नहीं लिया गया। जिले में रंगों की जांच के लिए आवश्यक मशीन तक उपलब्ध नहीं है, जिससे हर साल लोगों की सेहत जोखिम में पड़ रही है।

नईदुनिया की पड़ताल में सामने आया कि शहरी क्षेत्रों में बिक रहे केमिकलयुक्त रंगों की न तो नियमित जांच होती है और न ही छापेमारी के दौरान सैंपलिंग की जाती है। चार विभागों के बीच समन्वय के अभाव के कारण जांच व्यवस्था कागजों तक सीमित है। इसका असर यह है कि होली के बाद त्वचा रोगों के मामलों में लगातार वृद्धि हो रही है।

हर साल बढ़ते हैं त्वचा रोगी

आंबेडकर अस्पताल के त्वचा रोग विभाग के अनुसार होली के बाद बड़ी संख्या में मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं। हर साल 15 से 20 गंभीर मामले दर्ज होते हैं, जबकि शहरभर के अस्पतालों को मिलाकर लगभग 200 से 250 मरीज त्वचा संक्रमण, जलन और लाल चकत्तों की शिकायत लेकर पहुंचते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक एक हजार लोगों में करीब 20 से 25 प्रतिशत लोग रंगों के दुष्प्रभाव से प्रभावित होते हैं। महिलाओं और बच्चों में यह समस्या अधिक देखी जाती है, क्योंकि उनकी त्वचा अधिक संवेदनशील होती है।

ऐसे तैयार किए जाते हैं घातक रंग

जांच में यह भी सामने आया कि बाजार में बिक रहे कई रंग और गुलाल खतरनाक रसायनों से तैयार किए जाते हैं। रंगों में वार्निश पेंट और विभिन्न केमिकल मिलाए जाते हैं। गुलाल में मैदा, सेलखड़ी, रेत और मिट्टी तक मिलाई जाती है। गीले रंगों के पाउच में तेजाबी पानी और रंग का मिश्रण होता है। कुछ मामलों में डीजल, इंजन ऑयल, कॉपर सल्फेट, एस्बेस्टस और सिलिका जैसे हानिकारक तत्वों का उपयोग भी किया जाता है, जो त्वचा और आंखों के लिए बेहद नुकसानदायक हैं।

रंगों में छिपा स्वास्थ्य खतरा

विशेषज्ञों के अनुसार अलग-अलग रंगों में अलग प्रकार के खतरनाक रसायन पाए जाते हैं। लाल रंग में मर्क्यूरिक ऑक्साइड, हरे रंग में कॉपर सल्फेट, काले और नीले रंग में लेड तथा सिल्वर रंग में एल्युमीनियम ब्रोमाइड जैसे तत्व मिलाए जाते हैं, जो एलर्जी, आंखों की बीमारी, सांस संबंधी समस्या और यहां तक कि त्वचा कैंसर का खतरा बढ़ा सकते हैं। चमकीले रंगों में पिसा हुआ शीशा तक मिलाया जाता है, जिससे त्वचा को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है।

रहें सतर्क

तेज गंध वाले या अत्यधिक चमकीले रंगों से बचें, हर्बल या प्राकृतिक रंगों का उपयोग करें और रंग खेलने से पहले त्वचा पर तेल या मॉइस्चराइजर लगाएं। किसी भी प्रकार की जलन, खुजली या एलर्जी होने पर तुरंत चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते रंगों की नियमित जांच और सख्त निगरानी शुरू नहीं की गई तो हर साल त्योहार के बाद बढ़ने वाले त्वचा रोगों को रोक पाना मुश्किल होगा।

एक्सपर्ट का क्या कहना

डा. गौरव कुमार सिंह, कलेक्टर का कहना है कि हर्बल रंगों को लेकर लोगों में जागरूकता बढ़ी है और शिकायत मिलने पर पर्यावरण विभाग कार्रवाई करता है तथा सामग्री जब्त की जाती है।

डा. श्रुति दुबे मिश्रा, डर्मेटोलॉजिस्ट का कहना है कि होली के बाद आने वाले मरीजों में 20 प्रतिशत से अधिक लोग केमिकलयुक्त रंगों से हुए संक्रमण के शिकार होते हैं। महिलाओं और बच्चों को विशेष सावधानी बरतने की जरूरत है, क्योंकि उनकी त्वचा जल्दी प्रभावित होती है।

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