छत्तीसगढ़

पति की सैलरी 71 हजार, फिर भी पत्नी को नहीं मिलेगा गुजारा भत्ता, बिलासपुर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला


बिलासपुर हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि यदि पत्नी बिना किसी ठोस कारण के पति से अलग रह रही है, तो केवल पति की आर्थिक स्थिति के…और पढ़ें

Publish Date: Sat, 08 Aug 2026 08:43:32 AM (IST)Updated Date: Sat, 08 Aug 2026 08:45:19 AM (IST)

पति की सैलरी 71 हजार, फिर भी पत्नी को नहीं मिलेगा गुजारा भत्ता, बिलासपुर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला
पति से भरण-पोषण की मांग करने वाली पत्नी को हाई कोर्ट ने दिया झटका (AI तस्वीर)

HighLights

  1. पति का वेतन 71 हजार, फिर भी अकारण अलग रहने वाली पत्नी भरण-पोषण की हकदार नहीं
  2. कुटुंब न्यायालय ने 1 जुलाई 2026 को सुनवाई के बाद पत्नी का आवेदन खारिज कर दिया था
  3. हाई कोर्ट ने कुटुंब न्यायालय का आदेश बरकरार रखा; बेटी को 5 हजार रुपये देने का निर्देश बरकरार

नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर। हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि यदि पत्नी बिना किसी ठोस कारण के पति से अलग रह रही है, तो केवल पति की आर्थिक स्थिति के आधार पर वह भरण-पोषण की हकदार नहीं हो सकती। कोर्ट ने रायपुर कुटुंब न्यायालय के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें पत्नी का भरण-पोषण आवेदन खारिज किया गया था। हालांकि, सात वर्षीय बेटी के लिए पांच हजार रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण की राशि निर्धारित की गई है।

कोर्ट ने खारिज कर दी पत्नी की याचिका

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा की एकलपीठ ने निर्मला जैन व अन्य बनाम केशव लाल जैन मामले की सुनवाई करते हुए पत्नी की याचिका खारिज कर दी। मामले के अनुसार, निर्मला जैन और केशव लाल जैन का विवाह 25 मई 2015 को हुआ था और दोनों की एक बेटी है। दांपत्य विवाद के कारण अक्टूबर 2021 से दोनों अलग रह रहे हैं। पति केशव लाल जैन नारायणपुर जिले के ओरछा ब्लाक में शिक्षक हैं, जिनका मासिक वेतन 71,220 रुपये है। पत्नी ने कुटुंब न्यायालय में भरण-पोषण के लिए आवेदन दिया था, जिसमें उसने पति की आय और अपनी आर्थिक स्थिति का हवाला देते हुए भरण-पोषण की मांग की थी।

पत्नी ने हाई कोर्ट में क्रिमिनल रिवीजन दायर की थी

कुटुंब न्यायालय ने 1 जुलाई 2026 को सुनवाई के बाद पत्नी का आवेदन खारिज कर दिया, यह कहते हुए कि पत्नी यह साबित करने में असफल रही कि वह किसी ठोस कारण से पति से अलग रह रही है। पत्नी ने हाई कोर्ट में क्रिमिनल रिवीजन दायर की, जिसमें उसने पति की अधिक आय का हवाला देते हुए भरण-पोषण की मांग की। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 125 के तहत भरण-पोषण का अधिकार पाने के लिए यह साबित करना आवश्यक है कि पति ने पत्नी की उपेक्षा की है या उसका भरण-पोषण करने से इनकार किया है।

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मुख्य न्यायाधीश ने कुटुंब न्यायालय के रिकार्ड और साक्ष्यों का अवलोकन किया और पाया कि पत्नी ने यह स्थापित नहीं किया कि वह पति से अलग रहने के लिए मजबूर थी। इस प्रकार, केवल पति के वेतन को आधार बनाकर भरण-पोषण का आदेश नहीं दिया जा सकता।

हाई कोर्ट ने नाबालिग बेटी के लिए पांच हजार रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण की राशि को उचित माना और कुटुंब न्यायालय के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि कुटुंब न्यायालय के आदेश में कोई कानूनी त्रुटि नहीं है, इसलिए पत्नी की याचिका खारिज कर दी गई।



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