छत्तीसगढ़

पेंशन को लेकर छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, रिटायरमेंट के दिन लागू नियमों से ही तय होंगे लाभ


हाई कोर्ट ने पेंशन निर्धारण को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि किसी भी अधिकारी या कर्मचारी की पेंशन पात्रता उसकी सेवानिवृत्ति की ता …और पढ़ें

Publish Date: Mon, 25 May 2026 12:06:56 AM (IST)Updated Date: Mon, 25 May 2026 12:06:56 AM (IST)

पेंशन को लेकर छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, रिटायरमेंट के दिन लागू नियमों से ही तय होंगे लाभ
पेंशन पर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला।

HighLights

  1. पेंशन निर्धारण पर छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
  2. सेवानिवृत्ति की तारीख पर लागू नियमों से ही तय होगी पेंशन
  3. कोर्ट ने खारिज की पूर्व मुख्य सचिव आरएस विश्वकर्मा की याचिका

नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर। हाई कोर्ट ने पेंशन निर्धारण को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि किसी भी अधिकारी या कर्मचारी की पेंशन पात्रता उसकी सेवानिवृत्ति की तारीख पर लागू नियमों के अनुसार ही तय होगी। कोर्ट ने कहा कि बाद में लागू संशोधित नियमों का लाभ पूर्वव्यापी रूप से नहीं दिया जा सकता, जब तक कि नियमों में इसका स्पष्ट प्रावधान न हो।

याचिका खारिज करते हुए यह अहम टिप्पणी की

जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस संजय कुमार जायसवाल की डिवीजन बेंच ने छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग के पूर्व अध्यक्ष और पूर्व मुख्य सचिव आरएस विश्वकर्मा की याचिका खारिज करते हुए यह अहम टिप्पणी की। याचिकाकर्ता ने संशोधित सेवा नियमों के आधार पर अतिरिक्त पेंशन लाभ देने और 2020 की अधिसूचना को पूर्व प्रभाव से लागू करने की मांग की थी।

कोर्ट ने कहा कि पेंशन संबंधी अधिकार सेवानिवृत्ति की तिथि पर ही निर्धारित हो जाते हैं। आरएस विश्वकर्मा 16 जनवरी 2017 को सीजीपीएससी अध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हुए थे, जबकि संशोधित नियम एक अप्रैल 2018 से प्रभावी किए गए। इसलिए वे संशोधित पेंशन संरचना के तहत अतिरिक्त लाभ पाने के पात्र नहीं हैं।

अधिकतम संयुक्त पेंशन सीमा को लेकर था मुख्य विवाद

छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (सेवा शर्तें) विनियम, 2001 के विनियम 8(3) को लेकर था। विश्वकर्मा पहले ही मुख्य सचिव पद से 11.59 लाख रुपये वार्षिक पेंशन प्राप्त कर रहे थे, जबकि उस समय पीएससी अध्यक्ष के लिए अधिकतम संयुक्त पेंशन सीमा 4.80 लाख रुपये थी। इसी कारण उन्हें आयोग में सेवाकाल के लिए अतिरिक्त पेंशन नहीं मिली। बाद में 5 दिसंबर 2020 की अधिसूचना से यह सीमा बढ़ाकर 13.50 लाख रुपये वार्षिक कर दी गई।

याचिकाकर्ता ने दलील दी थी कि सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें एक जनवरी 2016 से लागू हुई थीं, इसलिए संशोधित पेंशन नियमों को भी उसी तारीख से लागू किया जाना चाहिए। उन्होंने पूर्व सदस्य एमएस पैकरा के मामले का हवाला देकर भेदभाव का आरोप भी लगाया।

वित्तीय नीतियां और कट-ऑफ डेट तय करना सरकार का नीतिगत अधिकार

हालांकि कोर्ट ने कहा कि दोनों मामलों की परिस्थितियां अलग थीं। पैकरा की पेंशन वैधानिक सीमा के भीतर थी, जबकि विश्वकर्मा की पेंशन पहले से ही तय सीमा से अधिक थी। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि वित्तीय नीतियों और कट-ऑफ डेट तय करना सरकार का नीतिगत अधिकार है, जिसमें न्यायालय सीमित परिस्थितियों को छोड़कर हस्तक्षेप नहीं कर सकता।

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हाई कोर्ट के फैसले की तीन बड़ी बातें

  • पेंशन का निर्धारण केवल सेवानिवृत्ति की तारीख पर लागू नियमों से होगा।
  • किसी संशोधन या परिपत्र की प्रभावी तिथि तय करने का अधिकार सरकार के पास है।
  • बाद के वेतन संशोधनों के आधार पर पुरानी पेंशन की पुनर्गणना नहीं की जा सकती, जब तक स्पष्ट प्रावधान न हो।



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