छत्तीसगढ़

जल शुल्क विवाद में छत्तीसगढ़ सरकार की SLP खारिज, केलो डैम बनने से पहले पानी का अतिरिक्त बिल वसूलना गलत


नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर। सुप्रीम कोर्ट ने अंजनी स्टील्स लिमिटेड से जुड़े पानी के शुल्क विवाद में छत्तीसगढ़ सरकार को बड़ा झटका दिया है। कोर्ट ने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के 18 सितंबर 2025 के फैसले में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए राज्य सरकार की विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) खारिज कर दी।

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने चार अगस्त 2026 को यह आदेश पारित किया। कोर्ट ने एसएलपी दाखिल करने में हुई देरी को माफ करने के बाद मामले की सुनवाई की, लेकिन हाई कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं पाया।

केलो डैम बनने से पहले अतिरिक्त पानी का शुल्क वसूला था

मामला रायगढ़ जिले के उजलपुर स्थित मेसर्स अंजनी स्टील्स लिमिटेड के स्टील एवं पावर प्लांट के लिए पानी आवंटन से जुड़ा है। राज्य ने वर्ष 2009 में कंपनी को केलो नदी/बांध से 1.81 मिलियन घन मीटर पानी सालाना आवंटित किया था। हालांकि, इस आवंटन में 1.52 एमसीएम अतिरिक्त पानी की आपूर्ति केलो बांध बनने के बाद की जानी थी। केलो बांध वर्ष 2012 में बना। इससे पहले कंपनी अपनी वास्तविक जरूरत के अनुसार प्राकृतिक जल स्रोत गरवानी नाला से 0.29 एमसीएम पानी ही ले रही थी।

इसके बावजूद जल संसाधन विभाग ने कंपनी से 1.81 एमसीएम के हिसाब से पानी का शुल्क मांगना शुरू कर दिया। कंपनी ने इसका विरोध किया और विवाद मध्यस्थता तक पहुंचा।

हाई कोर्ट ने मध्यस्थ के अवार्ड को सही माना था

एकल मध्यस्थ ने माना था कि केलो बांध बनने से पहले कंपनी से 1.52 एमसीएम अतिरिक्त पानी का शुल्क नहीं लिया जा सकता। प्राकृतिक स्रोत से लिए गए पानी पर वर्ष 2006 की अधिसूचना के अनुसार 0.90 रुपये प्रति घन मीटर की दर लागू होगी। मध्यस्थ ने यह भी माना था कि सरकार द्वारा पानी की मात्रा घटाकर 0.29 एमसीएम करने के बदले 20 वर्षों तक अतिरिक्त पानी की मांग नहीं करने की शर्त लगाना मनमाना, अनुचित और अन्यायपूर्ण था।

कमर्शियल कोर्ट ने मध्यस्थ के अवार्ड को बरकरार रखा। इसके बाद राज्य सरकार ने हाई कोर्ट में मध्यस्थता अधिनियम की धारा 37 के तहत अपील की। हाई कोर्ट की चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस बिभु दत्ता गुरु की खंडपीठ ने 18 सितंबर 2025 को अपील खारिज कर दी।

हाई कोर्ट ने कहा था- मध्यस्थ के निष्कर्ष में दखल का आधार नहीं

हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम की धारा 34 और 37 के तहत अदालत का दायरा बेहद सीमित है। अदालत मध्यस्थ के सामने रखे साक्ष्यों का दोबारा मूल्यांकन कर अपनी राय नहीं थोप सकती। मध्यस्थ द्वारा अनुबंध की शर्तों की उचित व्याख्या और साक्ष्यों के आधार पर निकाले गए निष्कर्ष में तभी हस्तक्षेप किया जा सकता है, जब अवार्ड में पेटेंट इललीगलिटी, भारतीय कानून की मूलभूत नीति का उल्लंघन या सार्वजनिक नीति के विरुद्धता जैसी गंभीर खामी हो।

हाई कोर्ट ने पाया था कि मध्यस्थ का फैसला उपलब्ध साक्ष्यों और अनुबंध की उचित व्याख्या पर आधारित है। इसमें कोई विकृति, पेटेंट अवैधता या सार्वजनिक नीति के विरुद्धता नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट में राज्य की चुनौती भी नाकाम

छत्तीसगढ़ सरकार ने हाई कोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट ने चार अगस्त 2026 को देरी माफ करने और अन्य औपचारिक आवेदन स्वीकार करने के बाद कहा कि हाई कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई उचित आधार नहीं है। इसके साथ ही एसएलपी खारिज कर दी गई और लंबित आवेदन भी निस्तारित कर दिए गए।

फैसले का असर

इस आदेश से अंजनी स्टील्स के पक्ष में हाई कोर्ट का निर्णय बरकरार रहा। यानी केलो बांध बनने से पहले कंपनी द्वारा प्राकृतिक जल स्रोत से वास्तविक रूप से लिए गए 0.29 एमसीएम पानी पर ही संबंधित दर से शुल्क लगाया जा सकता था। उस अवधि के लिए 1.52 एमसीएम अतिरिक्त पानी का शुल्क वसूलने का राज्य का दावा स्वीकार नहीं किया गया।



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