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जनगणना से पहले छिड़ी नई बहस: जनजातीय सुरक्षा मंच-CSHD की रिपोर्ट में आदिवासियों को ‘अन्य धर्म’ में दर्ज कराने का दावा

पांच माह बाद होने वाली मुख्य जनगणना से पहले मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के जनजातीय अंचलों में अन्य धर्म व मान्यताएं (अदर रिलिजन्स एंड पर्स्युएशन्स-ओआरपी) श्रेणी को लेकर नई बहस खड़ी हो गई है। आरएसएस से जुड़े जनजातीय सुरक्षा मंच और रायपुर स्थित रिसर्च संस्थान ‘सेंटर फॉर स्टडीज ऑन होलिस्टिक डेवलपमेंट’ (सीएसएचडी) की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि जनजातीय समाज के लोगों को जनगणना में धर्म के कॉलम में ‘हिंदू’ के बजाय ओआरपी दर्ज कराने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।

रिपोर्ट में इसे मध्य भारत के जनजातीय समाज को हिंदू समाज से अलग करने की सुनियोजित कोशिश बताया गया है। दावा किया गया है कि 50 से ज्यादा संगठन गोपनीय रूप से इसमें लगे हैं। इसके लिए अलग-अलग तरह के लालच देने का आरोप भी है। इसमें विदेशी मूल की मिशनरी संस्थाओं की भूमिका बताई गई है।

रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 20 साल में मध्य प्रदेश में ओआरपी आबादी 13 गुना बढ़ी है। मध्य प्रदेश में यह संख्या 45 हजार से बढ़कर 6 लाख हो गई है, जबकि छत्तीसगढ़ में 17 हजार से 5 लाख तक पहुंच गई है।

रिपोर्ट ने ओआरपी आबादी में वृद्धि को केवल धार्मिक पहचान तक सीमित नहीं माना है। इसमें मध्य भारत में गोंडवानालैंड और मालवा-निमाड़ क्षेत्र को मिलाकर अलग ‘भीलप्रदेश’ बनाने की मांगों को भी जनसांख्यिकीय बदलाव से जोड़ा गया है।

रिपोर्ट में धर्मांतरण का टू-स्टेप फॉर्मूला बताया गया है। स्टेप-1 के तहत जनजातीय समाज में प्रचार करना कि ‘आदिवासी हिंदू नहीं हैं’ और उन्हें गोंडी धर्म कोड, सरना कोड अथवा ओआरपी श्रेणी में दर्ज कराने के लिए प्रेरित करना। स्टेप-2 में मुख्यधारा से अलग पहचान स्थापित होने के बाद उन्हें ईसाई धर्म में परिवर्तित करने की प्रक्रिया शामिल है।

इसके लिए रिपोर्ट में नागालैंड और मेघालय का उदाहरण दिया गया है।

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