छत्तीसगढ़

बस्तर में माओवादी स्मारकों पर चल रहा साय-शाह का बुलडोजर, एक वर्ष में 70 से अधिक ध्वस्त


बस्तर क्षेत्र में माओवाद अपने अंतिम दौर में है। सुरक्षाबलों द्वारा बस्तर के दूरस्त इलाकों में भी माओवादी स्मारकों को गिराया जा रहा है। बीजापुर के अंदर …और पढ़ें

Publish Date: Sun, 15 Feb 2026 12:22:47 AM (IST)Updated Date: Sun, 15 Feb 2026 06:31:17 AM (IST)

बस्तर में माओवादी स्मारकों पर चल रहा साय-शाह का बुलडोजर, एक वर्ष में 70 से अधिक ध्वस्त
माओवादी स्मारकों पर चला बुलडोजर

HighLights

  1. एक वर्ष में माओवादी नेताओं समेत 70 से अधिक के स्मारक ध्वस्त
  2. इलाके में सुरक्षा बलों की बढ़ती पकड़ से ग्रामीणों में जागा भरोसा
  3. बस्तर में माओवादी स्मारकों पर चल रहा साय-शाह का बुलडोजर

अनिमेष पाल, नईदुनिया, जगदलपुर: बस्तर के जंगलों और दूरस्थ गांवों में कभी माओवादी वर्चस्व के प्रतीक रहे माओवादी नेताओं के स्मारक अब ढहते इतिहास बन रहे हैं। बीजापुर के अंदरूनी इलाकों में शुक्रवार को सुरक्षा बलों ने छह माओवादी स्मारकों को गिराया।

एक वर्ष के भीतर अब तक 70 से अधिक ऐसे ढांचे ध्वस्त किए जा चुके हैं, जिनमें पोलित ब्यूरो और केंद्रीय समिति स्तर के माओवादियों के नाम अंकित स्मारक भी शामिल हैं। यह कार्रवाई केवल ईंट-पत्थर तोड़ने तक सीमित नहीं, बल्कि उस वैचारिक और मनोवैज्ञानिक पकड़ को तोड़ने का संकेत है, जिसने वर्षों तक क्षेत्र में भय और प्रभुत्व बनाए रखा।

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के मार्च 2026 तक माओवाद उन्मूलन के लक्ष्य और राज्य में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय सरकार की सख्त रणनीति के बीच यह अभियान तेज हुआ है। अधिकारियों के अनुसार, बस्तर के 3900 गांवों में से कभी करीब 2800 गांव माओवादी प्रभाव में थे। सुरक्षा रिक्तता का लाभ उठाकर एक हजार से अधिक गांवों में ऐसे स्मारक खड़े किए गए थे, जिनमें से अधिकतर गांव में इन स्मारकों को हटाने की कार्रवाई की गई है और अब जिन गांवों में ऐसे स्मारक बचे हुए हैं, उन्हें चरणबद्ध तरीके से हटाया जा रहा है।

सुरक्षा बलों की इस कार्रवाई से अब ग्रामीणों की आवाज़ में भी बदलाव साफ झलकता है। बीजापुर के एक गांव के सरपंच कहते हैं, इन स्मारकों के रहते डर बना रहता था। अब सुरक्षा बलाें के आने के बाद भय खत्म हुआ है। स्कूल, राशन और स्वास्थ्य सेवाएं नियमित दिख रही हैं। एक युवा बताता है, पहले नारे और पोस्टर थे, अब कैंप और सड़कें हैं। यही असली बदलाव है।

सुरक्षा अधिकारियों का मानना है कि यह अभियान अस्थायी नहीं, बल्कि दीर्घकालिक शांति, विकास और पुनर्वास की दिशा में निर्णायक कदम है। जहां भय के प्रतीक गिर रहे हैं और कानून का शासन मजबूती से स्थापित हो रहा है।

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ढहाए गए शीर्ष माओवादी स्मारक

हाल के महीनों में शीर्ष माओवादी नेताओं के स्मारक भी निशाने पर रहे। इंद्रावती राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र में बनाए गए भाकपा (माओवादी) प्रमुख बसव राजू के स्मारक को 12 फरवरी को ध्वस्त किया गया। इससे पहले सालातोंग गांव में शीर्ष माओवादी रमन्ना के वर्षों पुराने विशाल स्मारक को 18 दिसंबर 2025 को गिराया गया। जनवरी 2025 में बीजापुर के भट्टीगुड़ा में पोलित ब्यूरो व केंद्रीय समिति सदस्य कट्कम सुदर्शन का स्मारक भी हटाया गया था।

बीते दो वर्षों में सुरक्षा बलों की पहुंच अंदरुनी क्षेत्रों तक सुदृढ़ हुई है। नए कैंप, बेहतर क्षेत्रीय नियंत्रण और स्थानीय सहयोग से माओवादी वर्चस्व सीमित इलाकों तक सिमट गया है। प्रतीकात्मक ढांचों का उन्मूलन वैचारिक प्रभाव को कमजोर करने की रणनीति का अहम हिस्सा है।

-सुंदरराज पी., बस्तर, आइजीपी



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