बस्तर की लोक आस्था का 75 दिवसीय पर्व संपन्न, मां दंतेश्वरी की डोली ससम्मान दंतेवाड़ा लौटी

75 दिवसीय ऐतिहासिक बस्तर दशहरा पर्व हाल ही में संपन्न हो गया। मंगलवार को मां मावली की डोली और मां दंतेश्वरी के छत्र को भावपूर्ण विदाई दी गई, जिसके साथ ही आस्था, परंपरा और लोक संस्कृति का यह महापर्व अगले वर्ष तक के लिए विराम ले लिया। यह आयोजन देवी-देवताओं के मिलन, विजय रथ की परिक्रमा और मुरिया दरबार जैसी बस्तर की विशिष्ट परंपराओं का साक्षी रहा, जिसने बस्तर की धरती को 75 दिनों तक अपने रंगों में रंगा।
बस्तर दशहरा की परंपरा के अनुसार, मां मावली की डोली और मां दंतेश्वरी का छत्र दंतेवाड़ा से जगदलपुर लाया जाता है। शारदीय नवरात्र के दौरान इनके आगमन के साथ ही मावली परघाव का विधान संपन्न होता है। बस्तर राजपरिवार और श्रद्धालु पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ माता की अगवानी करते हैं। इसके बाद डोली और छत्र को मां दंतेश्वरी मंदिर में विराजमान किया जाता है, जहां दशहरा के प्रमुख धार्मिक आयोजनों के दौरान श्रद्धालु दर्शन करते हैं।
12 अगस्त को पाट जात्रा के साथ शुरू हुआ बस्तर दशहरा रथ परिक्रमा, मावली परघाव, भीतर रैनी, बाहर रैनी, मुरिया दरबार और कुटुंब जात्रा जैसे प्रमुख पड़ावों से गुजर चुका है। इन 75 दिनों के दौरान बस्तर की विशिष्ट परंपराओं की झलक देखने को मिली, जिसमें देवी-देवताओं के मिलन से लेकर विजय रथ की परिक्रमा और मुरिया दरबार तक के अनुष्ठान शामिल थे।
दशहरा का अंतिम चरण, कुटुंब जात्रा, अपनी विशिष्ट पहचान रखता है। इस आयोजन में बस्तर संभाग के 84 परगनों और सीमावर्ती क्षेत्रों से पहुंचे 1700 से अधिक देवी-देवताओं के प्रतीकों को पारंपरिक पूजा-अर्चना और सम्मान के साथ विदाई दी गई। गांव-गांव से पहुंचे आंगा देव, छत्र और डोलियों की सहभागिता ने इस आयोजन को एक व्यापक सांस्कृतिक और आध्यात्मिक मिलन का स्वरूप प्रदान किया, जो बस्तर की समृद्ध लोक संस्कृति का परिचायक है।
बस्तर की परंपरा में देवी-देवताओं को केवल पूजा के प्रतीक के रूप में नहीं, बल्कि गांवों और समुदायों के साझा कुटुंब का हिस्सा माना जाता है। इसी भावना के साथ दशहरा में आमंत्रित देवी-देवताओं का स्वागत किया जाता है और आयोजन पूरा होने पर उन्हें सम्मानपूर्वक उनके मूल स्थानों के लिए विदा किया जाता है। यह परंपरा बस्तर के सामाजिक ताने-बाने में देवी-देवताओं की केंद्रीय भूमिका को दर्शाती है।
पर्व के सभी प्रमुख विधान पूरे होने के बाद, माता की डोली और छत्र को ससम्मान दंतेवाड़ा के लिए रवाना किया गया। आगमन के समय जिस तरह श्रद्धालुओं ने जयकारों और पारंपरिक स्वागत के साथ माता का अभिनंदन किया था, उसी तरह विदाई के अवसर पर भी श्रद्धा और आत्मीयता का भाव जुड़ा हुआ था। माता की डोली और छत्र के दंतेवाड़ा लौटने के साथ जगदलपुर में 75 दिनों से गूंज रहे जयकारे थम गए।
बस्तर दशहरा की खासियत यही है कि यहां उत्सव का अंत केवल एक आयोजन की समाप्ति नहीं, बल्कि देवी-देवताओं, ग्रामीण समुदायों और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं के बीच संबंधों को फिर से जीवंत करने का अवसर भी है। इस वर्ष के आयोजन का धार्मिक समापन हो चुका है, लेकिन बस्तर की लोक आस्था में अगले दशहरा की प्रतीक्षा अभी से शुरू हो गई है, जो एक साल बाद फिर से आस्था का कारवां जुटाएगा।

