छत्तीसगढ़

‘प्रमोशन कर्मचारियों का मौलिक अधिकार नहीं’, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला; खारिज की याचिकाएं


नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी भी कर्मचारी को पदोन्नति (Promotion) प्राप्त करना मौलिक अधिकार नहीं है। जस्टिस संजय अग्रवाल और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की डिविजन बेंच ने यह टिप्पणी करते हुए मुख्य नगरपालिका अधिकारी (CMO) पदोन्नति नियमों को चुनौती देने वाली सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया।

पदोन्नति को लेकर क्या था विवाद

इस मामले में मुख्य नगरपालिका अधिकारी पद पर पदोन्नत अधिकारियों, जिनमें पुष्पा खलखो सहित अन्य शामिल हैं, ने अलग-अलग याचिकाएं दायर की थीं। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि वे सिविल पदों पर कार्यरत अधिकारी हैं, जबकि राजस्व निरीक्षक केवल नगरपालिका सेवक हैं।

उनका तर्क था कि दो अलग-अलग वैधानिक श्रेणियों को एक समान मानकर प्रमोशन देना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत मिले समानता के अधिकार का उल्लंघन है। साथ ही, 2 फरवरी 2018 के आदेश के तहत राजस्व निरीक्षकों को एक वर्ष की सेवा में छूट देने को भी असंवैधानिक बताया गया था।

सरकार का नीतिगत अधिकार माना गया

डिविजन बेंच ने अपने फैसले में कहा कि पदोन्नति के लिए एक से अधिक फीडर कैडर तय करना और विभिन्न पदों की समकक्षता निर्धारित करना पूरी तरह सरकार और कार्यपालिका के नीतिगत दायरे में आता है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी कर्मचारी को प्रमोशन पाने का निहित अधिकार नहीं होता, बल्कि उसे केवल निर्धारित नियमों के अनुसार पदोन्नति के लिए विचार किए जाने का अधिकार होता है।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर दोबारा सुनवाई

इस मामले में पहले हाईकोर्ट की एक अन्य बेंच ने इन प्रावधानों को अवैध घोषित कर दिया था। इसके बाद राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी।

सुप्रीम कोर्ट ने 16 सितंबर 2025 को सुनवाई के बाद पुराने आदेश को कैंसिल कर दिया और मामले को नए सिरे से सुनवाई के लिए बिलासपुर हाईकोर्ट वापस भेज दिया था।

राजस्व निरीक्षकों को राहत

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि राजस्व निरीक्षकों को मुख्य नगरपालिका अधिकारी पद के लिए पात्र मानना असंवैधानिक नहीं है। इसके साथ ही, अब राजस्व निरीक्षक (RI) से CMO पद पर प्रमोशन का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है। डिविजन बेंच ने यह भी स्पष्ट किया कि यह निर्णय किसी भी मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं करता है।

अनुभव में छूट को भी ठहराया सही

राज्य सरकार ने राजस्व निरीक्षकों के लिए अनिवार्य छह वर्ष के अनुभव को घटाकर पांच वर्ष करने का निर्णय लिया था। कोर्ट ने इस फैसले को भी सही ठहराया। सरकार ने दलील दी थी कि विभाग में अधिकारियों की कमी को देखते हुए यह वन टाइम रियायत जनहित में दी गई थी। कोर्ट ने इसे उचित मानते हुए कहा कि यह निर्णय अवैध नहीं है।

याचिकाएं खारिज

अंत में कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता यह साबित करने में असफल रहे कि उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ है या नियम असंवैधानिक हैं। इसी आधार पर सभी याचिकाओं को निराधार बताते हुए खारिज कर दिया गया।



Source link

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!