छत्तीसगढ़

36 साल का लाल आतंक खत्म, छत्तीसगढ़ के कई जिले नक्सल मुक्त, अंतिम माओवादी भी मुख्यधारा में लौटे


रामकृष्ण डोंगरे, नईदुनिया रायपुर: प्रदेश में बस्तर और सरगुजा संभाग के साथ-साथ धमतरी, गरियाबंद, महासमुंद, कवर्धा, खैरागढ़-छुईखदान, राजनांदगांव और मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी जैसे जिले माओवादी हिंसा से मुक्त हो चुके हैं।

गुरुवार को राजनांदगांव-कांकेर बार्डर डिवीजन के अंतिम छह माओवादी भी मुख्यधारा में लौट आए। इन मैदानी जिलों में चलाए गए संयुक्त अभियानों और सतत कार्रवाई से यह बदलाव संभव हुआ है। 2023 से 2025 के बीच सुरक्षा बल ने इंटेलिजेंस आधारित आपरेशन तेज किए, जिसके परिणामस्वरूप माओवादी नेटवर्क कमजोर पड़ा और अंततः समाप्ति की ओर पहुंच गया।

2009 से 2026 तक लगातार कार्रवाई से आया बदलाव

धमतरी-गरियाबंद क्षेत्र में वर्ष 2009 से माओवादी गतिविधियों की शुरुआत हुई, जहां बोराई के घने जंगल ओडिशा और बस्तर के बीच मुख्य कारिडोर बने रहे। इसी मार्ग से माओवादियों की आवाजाही लगातार जारी रही। वर्ष 2009 में रिसगांव में हुए एंबुश और बारूदी सुरंग विस्फोट में 13 सुरक्षाकर्मी बलिदान हुए। इसके बाद नगरी-सिहावा क्षेत्र माओवादी प्रभाव का केंद्र बन गया।

पिछले 18 वर्षों में नगरी एरिया कमेटी, सीतानदी एरिया कमेटी सहित कई संगठन सक्रिय रहे, हालांकि उनका विस्तार सीमित रहा। समय-समय पर बैनर-पोस्टर और मुठभेड़ों से क्षेत्र में दहशत बनी रही। माओवादियों के खिलाफ सीआरपीएफ, बीएसएफ, डीआरजी और जिला पुलिस ने संयुक्त अभियान चलाए, जिससे उनका प्रभाव धीरे-धीरे कमजोर पड़ा। अब तक जिले में 17 माओवादी आत्मसमर्पण कर चुके हैं।

सरगुजा संभाग में थमी माओवादी हिंसा

सरगुजा संभाग में वर्ष 2003 के बाद माओवादी हिंसा का दौर तेजी से थमने लगा। उस समय बलरामपुर के पुलिस अधीक्षक रहे एसआरपी कल्लूरी के नेतृत्व में सख्त और रणनीतिक अभियान चलाया गया। शुरुआती दौर में माओवादी झारखंड सीमा से लगे इलाकों में सक्रिय थे और ग्रामीणों की हत्या व विकास कार्यों में बाधा डालते थे।

सरगुजा में पहले ही थम चुकी थी माओवादी हिंसा

पुलिस की प्रभावी रणनीति और लगातार अभियानों से दो-तीन वर्षों में माओवादियों की कमर टूट गई। इस दौरान सरगुजा रेंज के तत्कालीन आइजी अमरनाथ उपाध्याय की भूमिका भी अहम रही। छत्तीसगढ़ और पड़ोसी राज्य झारखंड पुलिस के संयुक्त प्रयासों से घुसपैठ पर रोक लगी और अब पूरे संभाग में माओवादी गतिविधियां समाप्त हो चुकी हैं, जिससे शांति और विकास का वातावरण स्थापित हुआ है।

धमतरी-गरियाबंद क्षेत्र की स्थिति

  • 2009–2026 में माओवादी प्रभाव
  • 2009 में रिसगांव एंबुश : 11 जवान बलिदान
  • 4 प्रमुख माओवादी संगठन सक्रिय थे
  • 17 माओवादियों का धमतरी जिले में 18 वर्षों में समर्पण

इस क्षेत्र में बड़े आत्मसमर्पण

  • जनवरी 2026 में धमतरी जिले में 47 लाख के इनामी नौ माओवादियों का समर्पण
  • अप्रैल 2025 में मोहला मानपुर में पांच लाख के इनामी माओवादी रुपेश का समर्पण
  • जुलाई 2024 में कवर्धा में 10 लाख व 15 लाख के इनामी माओवादियों का समर्पण।

राजनांदगांव से अलग होकर बने नए जिले मोहला मानपुर अंबागढ़ चौकी में 1981-90 के दशक में माओवाद की लहर पहुंची थी। नक्सलबाड़ी से शुरू होकर तेलंगाना, बस्तर के रास्ते जल-जंगल-जमीन की लड़ाई का नारा यहां बुलंद हुआ और मोहला, मानपुर व औंधी इसका गढ़ बना। वर्ष 2009 में पुलिस अधीक्षक विनोद कुमार चौबे सहित 29 जवान मानपुर के करीब कोरकोट्टी में माओवादियों के एंबुश में बलिदान हुए थे।

इसके बाद CRPF, ITBP की फोर्सेस के साथ संयुक्त बल ने यहां उन्नमूलन अभियान चलाया। साल दर साल माओवादियों का घेरा छोटा होता गया। लगभग 36 सालों के इस लाल पड़ाव का गुरुवार को कांकेर में माओवादियों के साथ अंत हो गया। यहां 36 साल तक रहा आतंक का साया, कोरकोट्टी में SP सहित 29 जवान बलिदान हुए थे



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