छत्तीसगढ़

गरियाबंद में चमत्कार! प्राचीन पत्थर पर उभरा ‘श्रीराम’ का नाम, रामायण काल से जुड़ा रहस्य


नईदुनिया प्रतिनिधि, छुरा। गरियाबंद जिले के विकासखंड छुरा अंतर्गत डोंगरीगांव (मुरमुरा) स्थित झरझरा माता मंदिर परिसर इन दिनों सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, पौराणिक एवं धार्मिक महत्व के कारण चर्चा का केंद्र बना हुआ है। घने जंगलों के बीच स्थित इस प्राचीन स्थल पर काले पत्थर में अंकित “श्रीराम” लेख मिला है, जिसे स्थानीय लोग आस्था और विरासत का प्रतीक मान रहे हैं। यह रहस्यमयी लेख अब शोधकर्ताओं एवं पुरातत्व विभाग के लिए भी अध्ययन का विषय बन गया है।

पुरातत्व विभाग ने शुरू किया निरीक्षण

स्थानीय शोधकर्ता राजकुमार यादव एवं गौकरण मानिकपुरी ने इस संबंध में पुरातत्व विभाग रायपुर, छत्तीसगढ़ शासन के डिप्टी डायरेक्टर जे.आर. भगत को जानकारी दी। सूचना मिलने के बाद विभागीय टीम ने स्थल पहुँचकर पत्थर की सफाई कर उसका निरीक्षण किया तथा कैमरे में चित्र कैद किए। विशेषज्ञों द्वारा अब इस लेख का अध्ययन कराया जाएगा, जिससे यह पता लगाया जा सके कि यह किस काल एवं सदी का है।

पुष्टि होने के बाद पत्थर को सुरक्षित संरक्षण में रखने की प्रक्रिया की जाएगी। विशेषज्ञों के अनुसार कुछ वर्ष पूर्व सिरपुर में खुदाई के दौरान लाल पत्थर पर इसी प्रकार की लिखावट मिली थी, जिसे वर्तमान में महंत गुरु घासीदास संग्रहालय रायपुर में सुरक्षित रखा गया है। अलग-अलग स्थानों पर समान प्रकार की लिखावट मिलने से यह विषय और अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।

रामायण काल से जुड़ाव और ‘सीता कुंड’ की मान्यता

स्थानीय शोधकर्ता लोहरसिंग निवासी राजकुमार यादव ने बताया कि डोंगरीगांव क्षेत्र लगभग 200 वर्षों से वीरान पड़ा हुआ है, लेकिन यहाँ आज भी प्राचीन संस्कृति और धार्मिक विरासत के अनेक प्रमाण मौजूद हैं। जनश्रुतियों एवं बुजुर्गों के अनुसार यह क्षेत्र दंडकारण्य वन क्षेत्र का हिस्सा माना जाता है, जिसका उल्लेख वाल्मीकि रामायण एवं तुलसीकृत रामायण के अरण्यकांड में मिलता है। मान्यता है कि भगवान श्रीराम वनवास काल के दौरान माता सीता एवं लक्ष्मण के साथ इस क्षेत्र में पहुँचे थे।

कहा जाता है कि जेठ माह की तपती दोपहरी में माता सीता को प्यास लगने पर आसपास जल नहीं मिला, तब भगवान श्रीराम ने कोंडक बाण चलाकर कुंड से जल प्रकट किया। वर्तमान में यह स्थान “सीता कुंड” के नाम से प्रसिद्ध है, जहाँ आज भी झिरिया से निरंतर जल निकलता रहता है। मान्यता है कि जिस पत्थर पर खड़े होकर भगवान श्रीराम ने कोंडक बाण चलाया था, उसी पत्थर पर “श्रीराम” अंकित है। वहीं समीप स्थित कल्पवृक्ष को भी श्रद्धालु धार्मिक आस्था से जोड़कर देखते हैं।

धसकुड: दस कुंडों का रहस्य

स्थानीय जनश्रुति के अनुसार इस बियाबान जंगल को वर्तमान में धसकुड कहते हैं, जो प्राचीन समय के दस कुंड हैं। आज भी यहाँ दस कुंड मौजूद हैं: (1) डोंगरीगांव झरझरा में सीता कुंड, (2) कुर्रुपानी कुंड, (3) गोईंदला पानी कुंड, (4) छुहीपानी “कुंड”, (5) घटारानी के पास बेंदरा चुआ कुंड, (6) लोटना पत्थरा कुंड, (7) केडीआमा के पास जामपानी कुंड, (8) सुरूंगपानी कुंड, (9) अग्नि कुंड और (10) जतमाई माता के नीचे कुंड है।

सभी कुंडों में जून माह की तपती धूप में बारहों महीने ठंडा पानी मौजूद रहता है। डोंगरीगांव में जतमाई माता वीरान जंगलों में पत्थरों के भीतर दर्शन देती थीं। बाद में कुसुमपानी क्षेत्र के जमींदार गुलाब राव महाडिक को माता ने दर्शन दिए, जिसके बाद चैत माह में जातरा मनाने की परंपरा प्रारंभ हुई। वर्तमान में चैत एवं क्वार नवरात्रि में यहाँ बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुँचकर ज्योति प्रज्वलित कर पूजा-अर्चना करते हैं।

प्राचीन सभ्यता के अवशेष और भविष्य की संभावनाएं

डोंगरीगांव पूर्व में स्वतंत्र राजस्व ग्राम था। लगभग 150 एकड़ से अधिक घने जंगलों से घिरे इस क्षेत्र में कुछ टुकड़ों में निजी भूमि स्वामी धान की खेती करते हैं। आज भी मिट्टी से बने पुराने घरों के अवशेष टीले के रूप में दिखाई देते हैं। यहां शीतला माता, ठाकुरदिया, बरदे बाबा सहित अनेक ग्राम देवी-देवताओं के प्राचीन स्थल सुरक्षित हैं। इसके अलावा पुराने समय के मिट्टी के बर्तन जैसे हड़िया, कुडेरा एवं कनौजी के अवशेष भी यहाँ खैरडेरा में मिलते हैं, जो इस क्षेत्र की प्राचीन सभ्यता और संस्कृति की पुष्टि करते हैं।

स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि इस स्थल का व्यवस्थित पुरातात्विक एवं ऐतिहासिक अध्ययन कराया जाए, तो क्षेत्र के कई महत्वपूर्ण ऐतिहासिक रहस्यों से पर्दा उठ सकता है। वर्तमान में यह स्थल धार्मिक आस्था, इतिहास और संस्कृति का अद्भुत संगम बनकर लोगों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।



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