छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ में रविशंकर महाराज बनाम सीबीआई… याचिका पर हाई कोर्ट ने 24 घंटे में मांगा हलफनामा, 24 जून को अगली सुनवाई


हाई कोर्ट ने ‘रविशंकर महाराज’ बनाम ‘सीबीआई’ मामले में फोन इंटरसेप्शन (फोन टैपिंग) के कानूनी पहलुओं को लेकर दोनों पक्षों से शपथ पत्र तलब किया है। …और पढ़ें

Publish Date: Mon, 15 Jun 2026 05:37:07 PM (IST)Updated Date: Mon, 15 Jun 2026 05:37:07 PM (IST)

छत्तीसगढ़ में रविशंकर महाराज बनाम सीबीआई... याचिका पर हाई कोर्ट ने 24 घंटे में मांगा हलफनामा, 24 जून को अगली सुनवाई
कोर्ट ने सक्षम अधिकारी के माध्यम से मांगा जवाब।

HighLights

  1. छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का सीबीआई पर सख्त रुख
  2. फोन टेपिंग से जुटाए सबूतों की वैधता को चुनौती
  3. कोर्ट ने सक्षम अधिकारी के माध्यम से मांगा जवाब

नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) के खिलाफ दायर एक अत्यंत संवेदनशील और तकनीकी मामले में सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने ‘रविशंकर महाराज’ बनाम ‘सीबीआई’ मामले में फोन इंटरसेप्शन (फोन टैपिंग) के कानूनी पहलुओं को लेकर दोनों पक्षों से शपथ पत्र तलब किया है।

मामले में नए दूरसंचार नियमों (2024) के तहत फोन टैपिंग से जुटाए गए सबूतों की कानूनी वैधता को चुनौती दी गई है। हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को 24 घंटे के भीतर और सीबीआई को 24 जून 2026 तक सक्षम अधिकारी के माध्यम से कोर्ट में जवाब दाखिल करने का कड़ा निर्देश दिया है।

दूरसंचार नियम 2024 का हवाला

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से देश के प्रतिष्ठित और वरिष्ठ अधिवक्ता मनु शर्मा (सहयोगी अधिवक्ता पंकज पांडेय, राहुल अंबस्ट, गिरीश त्रिपाठी और कार्तिक खन्ना) ने कोर्ट में जोरदार पैरवी की। उन्होंने ‘दूरसंचार (संदेशों के वैध अवरोधन के लिए प्रक्रियाएं और सुरक्षा उपाय) नियम, 2024’ के नियम 3 (3) (b) का हवाला देते हुए एक बड़ा कानूनी मुद्दा उठाया। उन्होंने दलील दी कि सक्षम प्राधिकारी द्वारा 28 जून 2025 को जारी फोन इंटरसेप्शन आदेश को नियमानुसार 7 कार्य दिवसों के भीतर समीक्षा समिति के समक्ष पुष्टि के लिए रखा जाना अनिवार्य था।

समीक्षा समिति की पुष्टि न होने पर साक्ष्यों की वैधता पर सवाल

अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि यदि समीक्षा समिति निर्धारित समय में इसकी पुष्टि नहीं करती है, तो वह आदेश स्वतः ही प्रभावहीन हो जाता है। ऐसी स्थिति में, उस निर्धारित अवधि के बाद सीबीआई द्वारा फोन टैपिंग से जुटाए गए किसी भी साक्ष्य को ट्रायल कोर्ट (निचली अदालत) द्वारा विचार में नहीं लिया जा सकता है।

हाईकोर्ट ने दिया नया शपथ पत्र दाखिल करने का निर्देश

चीफ जस्टिस की बेंच ने सुनवाई के दौरान पाया कि याचिकाकर्ता ने 28 जून 2025 के इंटरसेप्शन आदेश को मूल याचिका में सीधे चुनौती नहीं दी थी; यह मुद्दा बाद में एक अंतरिम आवेदन के जरिए उठाया गया था। कोर्ट ने कहा कि नए कानूनी आधार और मद्रास हाईकोर्ट के फैसले का उल्लेख स्पष्ट रूप से रिकॉर्ड पर नहीं है। इसलिए याचिकाकर्ता को निर्देश दिया गया कि वह 24 घंटे के भीतर सभी दलीलों को शामिल करते हुए नया शपथ पत्र दाखिल करे और उसकी प्रति सीबीआई के अधिवक्ता वैभव ए. गोवर्धन को उपलब्ध कराए।

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24 जून को होगी मामले की अगली संयुक्त सुनवाई

सुनवाई के दौरान सीबीआई के वकील ने कोर्ट को अवगत कराया कि इसी एफआईआर से जुड़े एक अन्य सह-आरोपी की याचिका भी हाईकोर्ट में विचाराधीन है, जिसे कोर्ट ने पहले ही 24 जून को सूचीबद्ध करने का आदेश दिया था। अब इस मामले की अगली संयुक्त सुनवाई भी 24 जून को ही होगी।



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