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बिलासपुर अंचल में छिपा है इतिहास और आस्था का अनुपम संगम, तालागांव की रुद्र-शिव प्रतिमा और मदकूद्वीप हैं आकर्षण का केंद्र

अविभाजित बिलासपुर संभाग प्राकृतिक सौंदर्य, घने जंगलों, नदियों और पर्वत श्रृंखलाओं की अनोखी धरोहर समेटे हुए है। मानसून की रिमझिम फुहारों के बीच इन पर्यटन स्थलों का अलौकिक सौंदर्य अपने शबाब पर है। इसी प्राकृतिक वैभव के बीच बिलासपुर अंचल में इतिहास और आस्था का ऐसा अनुपम संगम छिपा है, जो पूरी दुनिया में बेजोड़ है।

तालागांव में जहां सातवीं शताब्दी की विश्व प्रसिद्ध ‘रुद्र-शिव’ प्रतिमा विराजमान है, वहीं पास ही बहती शिवनाथ नदी के मध्य स्थित मदकूद्वीप में साक्षात केदार तीर्थ का अलौकिक आभास होता है। वर्ष 1987-88 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की देखरेख में तालागांव स्थित देवरानी मंदिर परिसर में उत्खनन कराया गया था।

इस खुदाई के दौरान एक अत्यंत विलक्षण और अनूठी प्रतिमा प्राप्त हुई। शैव संप्रदाय से संबंधित यह ‘रुद्र-शिव’ प्रतिमा भारतीय मूर्तिकला के इतिहास में अपने ढंग की एकमात्र ज्ञात प्रतिमा है। इस अद्भुत प्रतिमा की शारीरिक संरचना विभिन्न जीव-जंतुओं और आकृतियों के संयोजन से बनी है, जिसे देखने दुनिया भर से शोधकर्ता और पर्यटक खिंचे चले आते हैं।

दूसरी ओर, तालागांव के समीप स्थित मदकूद्वीप का मनोरम दृश्य बारिश के मौसम में केदारनाथ तीर्थ जैसा नजर आता है। पौराणिक काल में ‘हरिहर क्षेत्र केदार द्वीप’ के नाम से प्रसिद्ध यह स्थल मांडूक ऋषि की पावन तपोस्थली रही है। चारों ओर जलधारा से घिरे इस द्वीप में 8वीं और 10वीं शताब्दी के प्राचीन शिवलिंग, नंदी और प्रथम पूज्य भगवान गणेश की विभिन्न मुद्राओं में अद्भुत प्रतिमाएं स्थापित हैं।

प्रकृति की गोद में बसे इस क्षेत्र को यदि पर्यटन उद्योग के रूप में पूर्णतः विकसित किया जाए, तो यह पूरा संभाग देश के पर्यटन मानचित्र पर अपनी चमक बिखेरने को तैयार है। बारिश के दिनों में इन पर्यटन केंद्रों की आभा देखते ही बनती है। प्राकृतिक सौंदर्य के साथ ही साथ पौराणिक काल के महत्व के अनुसार यह हरिहर क्षेत्र केदार द्वीप के नाम जाना जाता है। नदी के मध्य द्वीप की मान्यता केदार तीर्थ के रूप में होती है। हमारा पूरा संभाग पौराणिक और ऐतिहासिक काल के साथ ही प्रकृति की गोद में समाया हुआ है।

छठवीं से दसवीं शताब्दी तक अत्यंत समृद्ध स्थल के रूप में पहचान बनाने वाला ताला तब शैव तांत्रिकों की अनुष्ठान स्थली रहा है। शैव उपासकों की धार्मिक स्थली रही ताला में अब रुद्र शिव के साथ ही देवरानी जेठानी मंदिर की भव्यता देखते ही बनती है। पुरातत्व विभाग के उत्खनन के बाद ताला में स्थापत्य व मूर्तिकला का रूप सामने आया है।

वर्ष 1987-88 में भारतीय पुरातत्व विभाग की देखरेख में देवरानी मंदिर के परिसर में उत्खनन किया गया है। इस दौरान एक विलक्षण प्रतिमा प्राप्त हुई। यह प्रतिमा भारतीय कला में अपने ढंग की एकमात्र ज्ञात प्रतिमा है। शैव संप्रदाय से संबंधित इस प्रतिमा का शिल्प अद्भुत है। शिव के रुद्र अथवा अघोर रूप में सामंजस्य होने के कारण सुविधा की दृष्टि से इसका नामकरण रुद्र शिव किया गया है। विश्व में अपने आप में अनोखी प्रतिमा 2.54 मीटर ऊंची और एक मीटर चौड़ी है। विभिन्न जीव जंतुओं की मुखाकृति से इसके अंग-प्रत्यंग को बनाया गया है। प्रतिमा समपद स्थानक मुद्रा में है। प्रतिमा में गिरगिट, मछली, केकड़ा, मयूर, कच्छप, सिंह आदि जीव जंतुओं का अंग बनाया गया है।

मदकू द्वीप ऐतिहासिक, धार्मिक एवं पर्यटन स्थल है। यह द्वीप पौराणिक महत्व को अपने आप में संजोये हुए है। प्रागैतिहासिक काल में शिवनाथ नदी के तटवर्ती क्षेत्र में आदिमानवों के आवास के प्रमाण मिले हैं। मदकूद्वीप भी इसमें से एक है। वर्षों पहले यहां आदि मानवों की स्थली रही है। यही कारण है कि पुरातात्विक उत्खनन के दौरान पाषाण युगीन औजार भी मिले हैं। इससे यह पुष्टि होती है कि यहां आदिमानवों का रहवास रहा है। यह प्रमुख रूप से उनकी गतिविधियों का केंद्र रहा है। इंडियन एपिग्राफी वर्ष 1959-60 के प्रतिवेदन में भी इसका साफतौर पर उल्लेख किया गया है।

उत्खनन के दौरान मदकू द्वीप से दो शिलालेख भी मिले हैं। इसमें से एक तकरीबन तीसरी सदी ईस्वी का ब्राम्ही शिलालेख है। दूसरा शिलालेख शंख लिपि में है। यह इस क्षेत्र का महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल है।

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