छत्तीसगढ़

PIL पर हाईकोर्ट सख्त, याचिका खारिज कर सुरक्षा राशि जब्त करने का दिया आदेश


नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय की डिवीजन बेंच ने राज्य के चर्चित कथित शराब घोटाले से जुड़ी जनहित याचिका को खारिज कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की युगलपीठ ने याचिका को आधारहीन बताते हुए कहा कि जब मामले की जांच सक्षम एजेंसियों द्वारा की जा रही है, तो अलग से अदालत की निगरानी में जांच या एसआईटी गठन की आवश्यकता नहीं है।

पत्रकार खिलवन चंद्राकर ने दायर की थी याचिका

यह जनहित याचिका धमतरी निवासी 64 वर्षीय पत्रकार और सार्वजनिक मामलों के विश्लेषक खिलवन चंद्राकर ने दायर की थी। याचिका में आरोप लगाया गया था कि राज्य के आबकारी ढांचे में गंभीर खामियां हैं, जिनके कारण समानांतर अवैध शराब नेटवर्क संचालित हुआ और सरकारी खजाने को भारी नुकसान पहुंचा। याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट से कई महत्वपूर्ण निर्देश जारी करने की मांग की थी।

याचिका में की गई थीं ये मांगें

याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट की निगरानी में स्वतंत्र उच्च स्तरीय समिति या विशेष जांच दल (SIT) के गठन की मांग की थी। इसके अलावा घोटाले में नाम सामने आए डिस्टिलरी ऑपरेटरों, निर्माताओं और परिवहनकर्ताओं के लाइसेंस छत्तीसगढ़ आबकारी अधिनियम, 1915 की धारा 31 और 34 के तहत निलंबित या रद्द करने की मांग भी की गई थी।

इसके साथ ही अवैध शराब परिवहन रोकने के लिए क्यूआर कोड आधारित परमिट, वाहनों की GPS ट्रैकिंग और डिजिटल वेरिफिकेशन सिस्टम लागू करने की मांग रखी गई थी। साल 2019 के बाद से राज्य में संचालित सभी शराब निर्माताओं और डिस्टिलरियों के फोरेंसिक और वित्तीय ऑडिट की मांग भी याचिका में शामिल थी।

सरकार और जांच एजेंसियों ने किया विरोध

राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता शशांक ठाकुर, केंद्र सरकार के डिप्टी सालिसिटर जनरल रमाकांत मिश्रा और प्रवर्तन निदेशालय (ED) के वकीलों ने याचिका का विरोध किया।

उन्होंने कोर्ट को बताया कि जिन आरोपों को आधार बनाकर याचिका दाखिल की गई है, उन मामलों में आर्थिक अपराध शाखा (EOW), एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) और प्रवर्तन निदेशालय पहले से जांच कर रहे हैं। कई मामलों में अदालत के सामने चार्जशीट भी पेश की जा चुकी है।

हाई कोर्ट ने कहा- समानांतर जांच की जरूरत नहीं

डिवीजन बेंच ने कहा कि याचिकाकर्ता स्वयं मान रहा है कि जांच एजेंसियां पहले से कार्रवाई कर रही हैं और मामले अदालतों में लंबित हैं। ऐसे में अलग से एसआईटी गठन या न्यायिक निगरानी का कोई औचित्य नहीं है।

कोर्ट ने कहा कि क्यूआर कोड, GPS ट्रैकिंग और डिजिटल सिस्टम लागू करना सरकार की नीति से जुड़े विषय हैं। आबकारी विभाग किस तरह काम करेगा और कौन सी तकनीक अपनाई जाएगी, यह कार्यपालिका का अधिकार है।

याचिकाकर्ता को व्यक्तिगत नुकसान नहीं हुआ

अदालत ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता ने सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध खबरों और एफआईआर की प्रतियों के आधार पर याचिका दाखिल की है। उसे इस मामले में कोई व्यक्तिगत या कानूनी नुकसान नहीं हुआ है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का दिया हवाला

हाई कोर्ट ने जनहित याचिकाओं के दुरुपयोग पर चिंता जताते हुए सुप्रीम कोर्ट के अशोक कुमार पांडेय बनाम पश्चिम बंगाल और उत्तरांचल राज्य बनाम बलवंत सिंह चौफाल जैसे फैसलों का उल्लेख किया।

कोर्ट ने कहा कि न्यायालयों का समय वास्तविक मामलों के लिए है। केवल प्रचार हासिल करने या पब्लिसिटी के उद्देश्य से दाखिल की जाने वाली याचिकाएं न्याय व्यवस्था पर अनावश्यक दबाव डालती हैं।

अंत में हाई कोर्ट ने याचिका को पूरी तरह मेरिटहीन मानते हुए खारिज कर दिया और याचिकाकर्ता की सुरक्षा राशि राजसात करने का निर्देश दिया।



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